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अध्याय- 5 नीतिशास्त्र : विकासवाद

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


नीतिशास्त्र में विकासवाद

प्रमुख विकासवादी विचारक
(1) हरबर्ट स्पेंसर
(2) लेस्ली स्टीफन
(3) सैम्युअल अलेक्जेंडर

(1)  हरबर्ट स्पेंसर :-  

डार्विन द्वारा जैविक विकासवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया ।इसके अनुसार विकास की प्रक्रिया निरंतर चलती जा रही है और हम अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सरलता से जटिलता की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
                              स्पेंसर ने इस विकासवाद के सिद्धांत का प्रयोग नैतिकता में किया अर्थात हम कम नैतिक व्यवस्था से अधिक नैतिक व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

नैतिक नियमों में भी संघर्ष चल रहा है। नए नैतिक नियम अस्तित्व में आ रहे हैं और पुराने नैतिक नियम विलुप्त हो रहे हैं। वे नैतिक नियम अस्तित्व में रहते हैं जो कि मनुष्य की आवश्यकताओं और सुरक्षा के लिए अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

 स्पेंसर के अनुसार नैतिकता के दो स्तर होते हैं :-

(A) सापेक्ष नैतिकता -  नैतिकता की वह अवस्था जब व्यक्ति, व्यक्तिगत हितों और सामाजिक हितों को विरोधाभासी मानता है तथा सामाजिक हितों की बजाय व्यक्तिगत हितों को अधिक महत्व देता है।
सामाजिक हितों की पूर्ति के लिए राज्य के द्वारा दंड और प्रलोभन का प्रावधान किया जाता है।

(B)निरपेक्ष नैतिकता - यह नैतिकता की आदर्श अवस्था है जब व्यक्ति को ज्ञान हो जाता है कि सामाजिक हित और व्यक्तिगत हित विरोधाभासी नहीं है तथा सामाजिक हितों से ही व्यक्तिगत हितों की पूर्ति भी होती है। इसलिए वह सामाजिक हितों को अधिक महत्व देता है।
               वर्तमान में यह स्थिति नहीं है परंतु भविष्य में इस स्थिति को प्राप्त कर लिया जाएगा क्योंकि नैतिकता का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है और व्यक्ति सामाजिक हितों के प्रति जागरूक होता जा रहा है।

 स्पेंसर  के अनुसार हमें पूर्व के नैतिक नियमों की आलोचना नहीं करनी चाहिए। क्योंकि वे नियम उस देश, काल, परिस्थिति के लिए आवश्यक थे। वह नैतिकता का एक स्तर था यदि वह स्तर ना होता तो वर्तमान का स्तर भी प्राप्त नहीं किया जा सकता था। भविष्य के नैतिक नियम और अधिक श्रेष्ठ होंगे।

 कुछ विचारकों  का मानना है कि व्यक्ति जन्म से ही स्वार्थी होता है तथा कुछ अन्य का मानना है कि व्यक्ति जन्म से ही परार्थी होता है। स्पेंसर के अनुसार व्यक्ति स्वार्थी और परार्थी दोनों ही प्रकार का होता है तथा दोनों ही आवश्यक भी है कुछ मामलों में व्यक्ति को स्वार्थी होना चाहिए तथा कुछ मामलों में परार्थी होना चाहिए।

स्पेंसर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थक है। परंतु यह स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता को बाधित नहीं करनी चाहिए ।

संसाधनों का वितरण योग्यता के आधार पर होना चाहिए परंतु कमजोर वर्ग को संरक्षण भी दिया जाना चाहिए इसे न्याय कहा गया है।

(2) लेस्ली स्टीफन :-   

यह भी डार्विन के जैविक विकासवाद का प्रयोग नैतिकता में करता है। यह अधिकतर बातों में स्पेंसर से सहमत है।
दो मुख्य असहमतियां है :-

(A) यह व्यक्तिगत हितों की बजाय सामाजिक हितों को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। सामाजिक हितों की पूर्ति के लिए व्यक्तिगत हितों का बलिदान भी दिया जा सकता है। इसके अनुसार व्यक्ति और समाज में वही संबंध होता है जो कि एक अंग और शरीर में होता है । अंग का शरीर से पृथक  कोई महत्व नहीं है इसका महत्व  शरीर के साथ ही होता है। उसी प्रकार व्यक्ति का भी समाज से पृथक कोई अस्तित्व नहीं है। अतः समाज की रक्षा के लिए व्यक्ति का बलिदान किया जाना चाहिए।

(B) स्टीफन के द्वारा निरपेक्ष नैतिकता की अवस्था की आलोचना की गई क्योंकि यह एक आदर्श तथा काल्पनिक अवस्था है। इसे कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।

(3) सैम्युअल अलेक्जेंडर :-  

इसके द्वारा डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का प्रयोग नैतिकता  में किया गया।

जिस प्रकार जीवों  में संघर्ष चल रहा है उसी प्रकार नैतिक नियमों में भी संघर्ष चल रहा है। वे जीव अस्तित्व में रहते हैं जिनकी समायोजन की क्षमता अधिक होती है। इसी प्रकार वे नैतिक नियम  अस्तित्व में रहते हैं जो कि अधिक तार्किक होते हैं।

 समाज में तार्किकता का स्तर लगातार बढ़ रहा है इसलिए नैतिकता का स्तर भी बढ़ रहा है।

 समाज में कुछ लोगों का तार्किकता का स्तर उच्च होता है परंतु समाज की तार्किकता का स्तर उनके समतुल्य नहीं होता है। ऐसे लोगों के द्वारा कही गई बातें कई बार समाज को स्वीकार नहीं होती इसलिए लोगों की हत्याएं भी कर दी जाती है। जैसे - सुकरात, अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी

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