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अध्याय-1 नीतिशास्त्र : मूल्य एवं आयाम

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC



नीतिशास्त्र : मूल्य एवं आयाम


समाज में सभी लोगों के विकास के लिए अन्य सभी के आचरण को नियमित करना आवश्यक है ।

Ethics शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के "एथिका" से हुई है जिसकी उत्पत्ति "एथिकॉस" से हुई है जिसका अर्थ होता है - रीति रिवाज ।

Ethics शब्द के समानांतर शब्द है "Morality" जो कि लेटिन भाषा के "मोरेस" से बना है जिसका अर्थ होता है  - रीति रिवाज अर्थात समाज में रहने वाले लोगों के आचरण को नियमित करने के लिए रीति-रिवाजों का निर्माण किया गया।

Ethics सैद्धांतिक है और Morality व्यवहारिक।

 नीतिशास्त्र की परिभाषा :-

 "यह एक आदर्श मूलक विज्ञान है। जिसमें समाज में रहने वाले सामान्य मनुष्य के ऐच्छिक आचरण,  सामाजिक नियमों ,दार्शनिक सिद्धांतों का नैतिक परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन किया जाता है तथा सही - गलत , उचित - अनुचित,  शुभ-अशुभ का निर्धारण किया जाता है तथा सामाजिक मानकों की स्थापना की जाती है।

निम्नलिखित को नीति शास्त्र के अध्ययन से बाहर रखा गया है:-
1.समाज में ना रहने वाले लोग।
2. मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति।
3. 7 वर्ष से कम आयु के बच्चे।
4. पशु पक्षी
5.अनैच्छिक कार्य
6.दबाव में किए गए कार्य।

नीति शास्त्र की पूर्व मान्यता  :-

संकल्प स्वातंत्र्य (freedom of will ) को नीतिशास्त्र की पूर्व मान्यता कहा जाता है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं लेता है और इसलिए उसे उसके निर्णयों के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

संकल्प  स्वातंत्र्य के लिए नियतिवाद को नकारना आवश्यक है। नियतिवाद का अर्थ है, कि जगत में सब कुछ पहले से ही निर्धारित है।
यदि नियतिवाद को स्वीकार किया जाता है तब किसी भी व्यक्ति को उसके निर्णयों और कार्यों हेतु उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

संकल्प स्वातंत्र्य के लिए तीन शर्ते आवश्यक है:-
1.विकल्पों की उपलब्धता
2.कार्य करने की क्षमता
3.परिणामों का ज्ञान।

नैतिकता के निर्धारक तत्व :-

नैतिकता के छह निर्धारक तत्व है :-

1. कृत्य :- कुछ कृत्य सदैव अनैतिक होते हैं। जैसे यौन उत्पीड़न, आतंकवाद आदि।

2. कर्ता :-  यदि कोई जिम्मेदार व्यक्ति कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तब उसे अनैतिक कहा जाएगा।

3. परिस्थिति :- नैतिकता का निर्धारण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में वह कृत्य किया गया है । जैसे - यदि कोई भूखा व्यक्ति भोजन की चोरी करता है तब उसे अनैतिक नहीं कहा जा सकता।

4 .इरादा :- यदि किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के इरादे से कोई कार्य किया गया है तो इसे अनैतिक कहा जाएगा ।

5.पीड़ित या लाभार्थी :-  कृत्य से पीड़ित है या लाभार्थी को ध्यान में रखा जाना चाहिए। जैसे किसी वृद्ध  और निराश्रित व्यक्ति की सहायता करना नैतिक है परंतु वैसी ही सहायता किसी युवा की करना अनैतिक है।

6.परिणाम :- यदि कृत्य अच्छे परिणामों के लिए किया जाता है तब उसे नैतिक कहा जाएगा।

निर्नैतिक कथन :-  वे कथन जो ना तो नैतिक है और ना ही अनैतिक। इन कथनों का नैतिक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता । जैसे - सूर्योदय पूर्व दिशा में होता है।

                         मूल्य (Values)


मूल्य का निर्धारण वस्तु या विचार की महत्ता से होता है।

 मानवीय मूल्य :- यह मनुष्य के गहरे विश्वास होते हैं जो कि उसके आचरण को प्रेरित करते हैं । यह सही भी हो सकते हैं और गलत थी परंतु व्यक्ति को लगता है कि यह सही है।

नैतिक मूल्य :- यह समाज के गहरे नैतिक आदर्श है जिन्हें समाज में स्थापित करने के लिए रीति-रिवाजों का निर्माण किया जाता है। जैसे - बड़ों का आदर करना एक आदर्श है इसीलिए बड़ों के पैर छूना एक रिवाज बनाया गया।

 मूल्य के प्रकार :-

उद्देश्य के आधार पर :- 

(1) साधन मुल्य:- वे मूल्य  जिनका प्रयोग किसी उच्चतर मूल्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। जैसे - व्यायाम , धन कमाना , विनम्रता , साहस ,धैर्य आदि

(2)  साध्य  मूल्य :- यह जीवन के परम उद्देश्य होते हैं। मनुष्य की सभी गतिविधियां इन मूल्यों की प्राप्ति के लिए की जाती है। जैसे - न्याय ,स्वतंत्रता ,समानता ,ज्ञान ,सत्य , कर्तव्य , सुख आदि ।

दृष्टिकोण  के आधार पर :-

(1) सकारात्मक मूल्य :- इन्हें समाज में प्रोत्साहित किया जाता है । जैसे सत्य , न्याय , धैर्य ,साहस आदि।

(2) नकारात्मक मूल्य :- इन्हें समाज में हतोत्साहित किया जाता है । जैसे - क्रोध , ईर्ष्या , अहंकार ,अन्याय आदि।

 मूल्यों की विशेषताएं :-

1.अलग-अलग समाज के लिए मूल्य अलग-अलग हो सकते हैं। यद्यपि एक समाज में इनके लिए सामान्य सहमति होती है इसलिए यह एक सापेक्ष वस्तुनिष्ठ अवधारणा है।

2. अलग-अलग पीढ़ियों में भी मूल्य अलग-अलग हो सकते हैं अर्थात मूल्य एक गत्यात्मक अवधारणा  है।

3. मुल्य आदर्श के रूप में होते हैं । इन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयास किए जाते हैं परंतु पूर्ण रूप से समाज में इनकी स्थापना नहीं की जा सकती।

4. मूल्य जन्मजात नहीं होते इन्हें समाज, परिवार और शिक्षण संस्थानों से सीखा जाता है।

5. मूल्य आत्म निष्ठ भी होते हैं और वस्तुनिष्ठ भी होते हैं। सामान्यतः साधन मूल्य आत्म निष्ठ होते हैं और साध्य मूल्य वस्तुनिष्ठ होते हैं।

6. मूल्यों का एक सोपान क्रम होता है अर्थात कुछ मूल्य अधिक महत्वपूर्ण होते हैं तथा कुछ मूल्य कम महत्वपूर्ण होते हैं।

7. मूल्य अमूर्त होते हैं।

 मूल्य निर्माण में परिवार की भूमिका :-

परिवार से प्रथम सामाजिकरण की प्रक्रिया की शुरुआत होती है। बचपन में व्यक्ति सबसे ज्यादा परिवार के ही संपर्क में रहता है। इसलिए उसकी समझ पर परिवार का प्रभाव सर्वाधिक होता है। इसी काल में व्यक्ति के प्राथमिक मूल्यों का निर्माण होता है, जो कि जीवनपर्यंत उसके आचरण को प्रभावित करते हैं इसीलिए परिवार को पहली पाठशाला कहा जाता है।

समाज में व्यक्ति परिवार का ही प्रतिनिधि होता है। परिवार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका माता की होती है क्योंकि बच्चे का जुड़ाव माता से अधिक होता है। महान व्यक्तियों के चरित्र निर्माण में भी माता की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। जैसे - शिवाजी के चरित्र में जीजा बाई की भूमिका , महाराणा प्रताप के चरित्र में जयवंता बाई की  भूमिका।

परिवार में मूल्य निर्माण हेतु भूमिका निर्वहन , प्रशंसा , निंदा तथा प्रशिक्षण का प्रयोग किया जाता है।

माता से सीखे जाने वाले मूल्य :-
1. ममत्व                2. करुणा                           3. दया
4. त्याग                 5. धैर्य                                 6. दूसरों की देखभाल करना
7. बड़ों का आदर करना

पिता से सीखे जाने वाले मूल्य :-
1. संघर्ष                2. अनुशासन             3. साहस
4. आत्मनिर्भरता    5. नेतृत्व                    6. उत्तरदायित्व का निर्वहन
7. सामाजिकता     8.सहनशीलता।

भाई-बहन से सीखे जाने वाले मूल्य :-
1. सहयोग की भावना             2. बंधुत्व
3. साझा करने की भावना        4. स्नेह

 दादा-दादी से सीखे जाने वाले मूल्य :-
1. आध्यात्मिकता व धार्मिकता
2. नैतिकता
3. महापुरुषों का जीवन चरित्र

परिवार से सीखे जाने वाले नकारात्मक मूल्य :-
1. अंधविश्वास                  2. रूढ़िवादिता
3. संकीर्णता                    4. अंधी आज्ञाकारिता

 मूल्य निर्माण में समाज की भूमिका :-

दूसरे समाजीकरण की प्रक्रिया समाज से शुरू होती है क्योंकि 10 - 12 वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति का समाज से संपर्क बढ़ जाता है।

प्रारंभिक वर्षों में मित्र मंडली का प्रभाव सर्वाधिक होता है ।

जैसे-2 व्यक्ति की समझ बढ़ती है, वह सामाजिक घटनाओं को देखकर भी सामाजिक मूल्यों का निर्माण करता है । इसी काल में व्यक्ति के राजनैतिक मूल्य भी विकसित होते हैं।

बाद के वर्षों में व्यवसायिक मूल्य अधिक महत्वपूर्ण बन जाते हैं।
 व्यक्ति की मित्र मंडली में जितनी विविधता होगी व्यक्ति की सोच उतनी ही व्यापक होगी

सामाजिक दबाव के कारण व्यक्ति  गैर-सामाजिक गतिविधियों से दूर रहता है। समाज में भी प्रशंसा और निंदा का प्रयोग किया जाता है।

समाज से सीखे जाने वाले सकारात्मक मूल्य :-
1. सामाजिक सौहार्द              2. सहिष्णुता
3. आपसी सम्मान                  4. सामूहिक प्रयास
5. सहयोग की भावना             6. राजनैतिक मूल्य
7. व्यवसायिक मूल्य               8. प्रकृति प्रेम

समाज से सीखे जाने वाले नकारात्मक मूल्य :-
1. सांप्रदायिकता                     2. जातिवाद
3. लिंगभेद                             4. छुआछूत
5. भ्रष्टाचार                             6. हिंसा
7. आर्थिक भेदभाव                 8. अंधविश्वास

मूल्य  निर्माण में शिक्षण संस्थानों की भूमिका :-

शिक्षण संस्थानों का मुख्य कार्य है परिवार और समाज से सीखे गए सकारात्मक मूल्यों को प्रोत्साहित करना तथा नकारात्मक मूल्यों को हतोत्साहित करना तथा कुछ ऐसे सकारात्मक मूल्यों का निर्माण करना जो कि परिवार और समाज में उपलब्ध नहीं है। जैसे - तार्किकता , वैज्ञानिक दृष्टिकोण , धर्मनिरपेक्षता , संवैधानिक मूल्य।

शिक्षण संस्थानों में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि शिक्षक का चरित्र सशक्त है तब विद्यार्थी पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

प्रारंभिक शिक्षा की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है।

भारत में मूल्य निर्माण में शिक्षण संस्थानों की भूमिका सीमित रही है क्योंकि शिक्षा का प्रसार सीमित है।  प्राथमिक शिक्षा मूल्य केंद्रित न होकर परिणाम केंद्रित है जबकि उच्च शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। शिक्षा रोजगार प्राप्त करने का एक साधन मात्र बनकर रह गई है।

                       नीतिशास्त्र के आयाम


नीति शास्त्र के आयामों को दो आधार पर वर्गीकृत किया गया है:-
1. शाखाओं के आधार पर
2. आधुनिक विचारकों के आधार पर

शाखाओं के आधार पर नीतिशास्त्र के 3 आयाम है :-  

1. मानकीय या नियामक नीतिशास्त्र:- इसे भी तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है :-

(A) परिणाम निरपेक्ष नीतिशास्त्र। जैसे - इमैनुअल कांट , भगवद्गीता,   अंतः प्रज्ञावादी।       
(B) परिणाम सापेक्ष नीति शास्त्र:-  जैसे -विकासवाद , आत्मपूर्णतावाद     
(C) सद्गुण नीति शास्त्र :-जैसे - सुकरात , प्लेटो ,अरस्तु , कन्फ्यूशियस ,लाओ त्से तुंग


2. अधि नीति शास्त्र :-  इसमें नैतिक अवधारणाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाता है। जैसे - सुख क्या है , न्याय क्या है , ज्ञान क्या है , कर्तव्य क्या है, आदि ।

3. व्यवहारिक नीतिशास्त्र :-   इसमें विभिन्न व्यापारिक नियमों व संस्थानों का अध्ययन किया जाता है , जैसे -

(A) चिकित्सकीय नीतिशास्त्र :-  इसके तहत चिकित्सकों ,  चिकित्सकीय कर्मचारियों , संस्थानों तथा चिकित्सकीय नियमों का नैतिक मूल्यांकन किया जाता है तथा इनके व्यवहार को नियमित करने के लिए आचार संहिता बनाई जाती है । जैसे - चिकित्सकों का हड़ताल पर जाना अनैतिक है।

(B) खेल नीतिशास्त्र :- इसके तहत खिलाड़ियों , खेल संस्थानों व नियमों का नैतिक मूल्यांकन किया जाता है। जिससे इनके व्यवहार को नियमित किया जा सके। जैसे - हार-जीत की भावना के बजाय खेल भावना से खेलना नैतिक होता है।

(C) प्रशासकीय नीतिशास्त्र :-  इसमें प्रशासकों , प्रशासकीय संस्थानों तथा नियमों का नैतिक मूल्यांकन किया जाता है। जैसे प्रशासक द्वारा रिश्वत लेना अनैतिक है।

(D) व्यवसायिक नीतिशास्त्र :-  व्यवसायियों , व्यवसायिक संस्थानों और नियमों का नैतिक मूल्यांकन किया जाता है। जैसे गलत विज्ञापन छापना अनैतिक है।

(F) पर्यावरणीय  नीतिशास्त्र :- इसके अंतर्गत मनुष्य तथा पर्यावरण के बीच संबंधों का नैतिक परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन किया जाता है। जैसे पर्यटकों के द्वारा प्लास्टिक कचरे को फैलाया जाता है, तो इसे अनैतिक कहा जाएगा।

आधुनिक विचारको के आधार पर नीतिशास्त्र के अग्रलिखित आयाम है :-

(1) मार्क्सवादी नीतिशास्त्र :- इसके अनुसार समाज दो वर्गों में बंटा हुआ है - बुर्जुआ वर्ग और सर्वहारा वर्ग। इन दोनों वर्गों के बीच संघर्ष चल रहा है। वर्तमान के नैतिक नियम बुर्जुआ  वर्ग द्वारा बनाए गए हैं। जिससे कि उनके हितों की रक्षा की जा सके इन नैतिक नियमों की पुनर्व्याख्या की जानी चाहिए। जैसे सामान्यतया अहिंसा को नैतिक माना जाता है परंतु वास्तविक रूप से हिंसा नैतिक है। इसी प्रकार मार्क्स धर्म ,ईश्वर , परिवार , विवाह आदि संस्थानों का विरोध करता है।

(2) नारीवादी नीतिशास्त्र :- नारीवादियों के अनुसार नैतिक नियम पुरुषों द्वारा बनाए गए हैं जो कि पुरुषों के हितों की रक्षा करते हैं। जिसे मेनस्ट्रीम कहा जाता है वह वास्तविक रूप में मेलस्ट्रीम है। अतः नैतिक नियमों की पुनर्व्याख्या की जानी चाहिए। सामान्यतया माना जाता है कि निजी जीवन में सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए परंतु अधिकतर शोषणकारी गतिविधियां निजी जीवन में ही होती है। अतः नारीवादी निजी जीवन में भी सरकारी हस्तक्षेप के समर्थक है। भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून नारीवादी  विचारों से प्रेरित है।

(3) अश्वेत नीतिशास्त्र :-  इसके अनुसार नैतिक नियमों की व्याख्या श्वेत लोगों के द्वारा की गई है। इसलिए यह श्वेत लोगों की ओर झुके हुए हैं। इन नैतिक नियमों की पुनर्व्याख्या की  जानी चाहिए । त्वचा के रंग से किसी का भी नैतिक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ऐसे लोगों को अपने रंग के प्रति उत्साह वर्धक हो रहना चाहिए। इन्होंने ब्लैक इज ब्यूटीफुल अभियान चलाया जो गोरेपन की क्रीम का विरोध करता है। भारत में इस अभियान से नंदिता दास जुड़ी हुई है।

(4) फ्रॉयड का नीतिशास्त्र :- फ्रॉयड एक मनोवैज्ञानिक था इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति  में कुछ मूलभूत प्रवृत्ति होती है। जैसे भूख,  प्यास , नींद इन मूल प्रवृत्तियों के कारण व्यक्ति के विशेष व्यक्तित्व का निर्माण होता है जिसे इड कहा जाता है ।चूंकि  व्यक्ति समाज में रहता है इसलिए एक सामाजिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है जिसे सुपरइगो कहा जाता है।
सुपर ईगो तथा इड के बीच संघर्ष होता है। जिन लोगों की इड सशक्त होती है वे जीवन में कम सफल और कम नैतिक होते हैं तथा जिन लोगों की सुपरईगो सशक्त होती है, वे जीवन में  अधिक नैतिक और अधिक सफल होते हैं।

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