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एकी आंदोलन ।। भोमट भील आंदोलन




एकी आंदोलन ।। भोमट भील आंदोलन

भोमट क्षेत्र के भीलों द्वारा चलाए जाने के कारण इसे भोमट  भील आंदोलन भी कहा जाता है।

इस आंदोलन के जरिए भील एवं गरासिया जनजातियों में एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया था। इस कारण इसे एकी आंदोलन कहते हैं।

1917 में बिजौलिया किसान आंदोलन से प्रभावित होकर मेवाड़ की पहाड़ा जागीर के भीलों ने आंदोलन शुरू  किया।
1918 में मेवाड़ महाराणा द्वारा कुछ मांगे मान लिए जाने पर आंदोलन शिथिल पड़ गया।

1921 में मादडीपट्टा क्षेत्र के भीलों ने आंदोलन किया। मोतीलाल तेजावत द्वारा इस आंदोलन का नेतृत्व किया गया।

मोतीलाल तेजावत का जन्म कोल्यारी गांव (उदयपुर) के ओसवाल परिवार में हुआ था। ये मेवाड़ रियासत में झाडोल ठिकाने में कामदार थे।

चित्तौड़गढ़ के मातृकुंडिया नामक स्थान से वैशाख पूर्णिमा को इस आंदोलन की विधिवत शुरुआत हुई थी।
मातृकुंडिया को राजस्थान का हरिद्वार भी कहा जाता है।

मोतीलाल तेजावत एवं गोकुल जी जाट ने मेवाड़ महाराणा के सामने 21 मांगे रखी। इस मांग पत्र को मेवाड़ की पुकार कहा जाता है। इनमें से 18 मांगे मान ली गई।
निम्नलिखित तीन मांगे नहीं मानी गई -
1. वन संपदा से संबंधित मांग
2. बेगार से संबंधित मांग
3. सूअरों के उत्पात से संबंधित मांग

31 दिसंबर 1921 को 50 से अधिक भीलों के एक स्थान पर एकत्रित होने पर रोक लगा दी गई। मोतीलाल तेजावत को गिरफ्तार करने वाले के लिए ₹500 का ईनाम रखा गया।
मोतीलाल तेजावत सिरोही की तरफ पलायन कर गए।

नीमडा हत्याकांड
6 या 7 मार्च 1922 को विजयनगर रियासत के नीमडा गांव में भीलों की सभा पर मेजर सटन ने फायरिंग कर दी जिसमें 1200 भील शहीद हो गए। मोतीलाल तेजावत फरार हो गए।

सिरोही के भीलों का एकी आंदोलन

यहां के भीलों ने तिल की फसल का टैक्स जमा नहीं कराया।
भीलों ने आबू रोड से लेकर अम्बाजी तक के क्षेत्र की रखवाली करने से इनकार कर दिया।

सिरोही के दीवान रमाकांत मालवीय (मदन मोहन मालवीय के पुत्र) ने आंदोलन समाप्ति के लिए गांधीजी एवं विजय सिंह पथिक की सहायता ली।

गांधीजी ने अपने यंग इंडिया समाचार पत्र में मोतीलाल तेजावत एवं इस हिंसक आंदोलन का असमर्थन किया।

विजय सिंह पथिक ने रामचंद्र वैद्य एवं हरि ब्रह्मचारी को साथ लेकर भगवानगढ़ नामक स्थान पर मोतीलाल तेजावत से बातचीत की।

12 फरवरी 1922 को रमाकांत मालवीय एवं विजय सिंह पथिक ने गोपेश्वर नामक स्थान पर भील किसानों से हिंसक आंदोलन न करने की अपील की।

आंदोलन यथावत जारी रहा। सरकार ने सियावा और बालोलिया/भूला नामक स्थानों पर फायरिंग करवा दी।

फायरिंग में 12 अप्रैल 1922 को सियावा में तीन गरासिया किसान शहीद हो गए।

मेजर प्रिचार्ड के अनुसार 5/6 मई 1922 को बालोलिया/भूला में की गई फायरिंग में 50 किसान शहीद एवं 150 घायल हो गए।

राजस्थान सेवा संघ के राम नारायण चौधरी और सत्यभक्त ने इस हत्याकांड की जांच की। तरुण राजस्थान समाचार पत्र में घटनाक्रम प्रकाशित किया गया।

23 मई 1922 को किसानों ने सरकार के साथ समझौता कर लिया।

1923 में मोतीलाल तेजावत ने छोछर (देलवाड़ा) नामक स्थान से आंदोलन को पुनः शुरू करने का प्रयास किया।
ईडर प्रजामंडल ने आंदोलन को समर्थन दिया।

1929 में ईडर रियासत के खेडब्रह्मा नामक स्थान पर मोतीलाल तेजावत ने आत्मसमर्पण कर दिया।

1936 में गांधीजी के पीए मणिलाल कोठारी के कहने पर महाइन्द्राज सभा ने मोतीलाल तेजावत को रिहा कर दिया।

महाइन्द्राज सभा
यह मेवाड़ रियासत का सुप्रीम कोर्ट था जिसकी स्थापना 1880 में मेवाड़ महाराणा सज्जन सिंह द्वारा की गई।

मोतीलाल तेजावत का निधन 1963 में हुआ।
इन्हें आदिवासियों का मसीहा कहा जाता है।
भील इन्हें बावजी कहते थे।


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