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बीकानेर किसान आंदोलन



बीकानेर किसान आंदोलन

बीकानेर में खालसा क्षेत्र के अंतर्गत 1930-31 में गंगनहर क्षेत्र में आंदोलन हुआ।

बीकानेर की जागीर भूमि वाले क्षेत्रों में निम्नलिखित किसान आंदोलन हुए -
उद्रासन किसान आंदोलन - 1937 - बीकानेर
महाजन किसान आंदोलन -1938 - बीकानेर
दूधवाखारा किसान आंदोलन - 1944 - चुरू
कांगड़ किसान आंदोलन - 1946 - चुरू

गंगनहर क्षेत्र में आंदोलन
गंगनहर के निर्माण (1927) से पूर्व 1923 में इस क्षेत्र में सिक्ख किसानों को जमीन आवंटित की गई।

1929 में किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया।
आंदोलन के निम्नलिखित कारण थे -
1. भू-राजस्व अधिक लिया जा रहा था।
2. आबियाना (सिंचाई कर) की दर अधिक थी।
3. जमीन की किस्तों पर ब्याज बढ़ जाना।

किसानों ने जमींदारा संघ नामक संगठन बनाया जिसके प्रमुख नेता करतार सिंह और दरबार सिंह थे।

NOTE:- पंजाब क्षेत्र में किसान को जमींदार कहा जाता है।

महाराजा गंगा सिंह ने किसानों की मांगे स्वीकार कर ली और रियासत कालीन आंदोलन समाप्त हो गया।
यह आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

जागीर क्षेत्र वाले आंदोलन

कारण - अधिक भू-राजस्व, अधिक लाख-बाग (37 प्रकार), बेगार प्रथा

उद्रासन किसान आंदोलन - 1937 - बीकानेर
प्रमुख नेता - जीवन राम चौधरी

महाजन किसान आंदोलन -1938 - बीकानेर
चूंकि महाजन एक बड़ा ठिकाना था। अतः यहां कुम्भाना एवं पूगल क्षेत्रों में भी आंदोलन हो गया।
1942 में महाराजा गंगा सिंह के कहने पर यहां के सामंत भोपाल सिंह ने किसानों के साथ समझौता कर लिया और भूमि बंदोबस्त करा दिए गए और रसीद प्रणाली शुरू की गई।

दूधवाखारा किसान आंदोलन - 1944 - चुरू
यह आंदोलन सामंत सूरजमाल सिंह के विरुद्ध किया गया।
प्रमुख नेता - हनुमान सिंह आर्य।
हनुमान सिंह आर्य को तीन बार गिरफ्तार किया गया जिसमें एक बार उन्होंने 65 दिन की भूख हड़ताल की थी।

कांगड़ किसान आंदोलन - 1946 - चुरू
प्रमुख नेता - मेघ सिंह आर्य

प्रजामंडल या प्रजा परिषद का योगदान

बीकानेर प्रजामंडल के संस्थापक वैध मघाराम को दूधवाखारा किसान आंदोलन के अंतर्गत 6 जुलाई 1945 को गिरफ्तार किया गया। अतः बीकानेर रियासत में 6 जुलाई को किसान दिवस मनाया जाता था।

7 अप्रैल 1946 को ललाणा गांव (वर्तमान में हनुमानगढ़ में) में किसानों की सभा को प्रजा परिषद ने समर्थन दिया था। इस किसान सभा में चौधरी कुंभाराम आर्य ने भाग लिया था।

30 जून 1946 को रायसिंहनगर में किसानों एवं प्रजामंडल की दो दिवसीय बैठक हुई। 1 जुलाई 1946 को किसानों के जुलूस पर फायरिंग की गई जिसमें बीरबल नामक किशोर शहीद हो गया।
इस घटना के विरोध में 17 जुलाई 1946 को बीकानेर रियासत में बीरबल दिवस मनाया गया।
कालांतर में इंदिरा गांधी नहर की जैसलमेर शाखा का नाम बीरबल शाखा कर दिया गया।
रायसिंहनगर कांड की जांच के लिए एक 3 सदस्यीय समिति गठित की गई। हीरालाल शास्त्री, गोकुलभाई भट्ट, रघुवर दयाल गोयल इस समिति के सदस्य थे।

3 सितंबर 1946 को गोगामेडी किसान सभा में जागीरी उन्मूलन पर बल दिया गया।

राजस्थान में किसानों की स्थिति

1. राजस्थान में 40% खालसा भूमि जबकि 60% जागीर भूमि थी। अतः तिहरे नियंत्रण के कारण किसानों का शोषण अधिक था।
पूर्वी एवं दक्षिण पूर्वी राजस्थान की रियासतों में खालसा भूमि अधिक थी। (अलवर, कोटा, बूंदी)
पश्चिमी राजस्थान की रियासतों में जागीर भूमि अधिक थी। (जोधपुर, बीकानेर)

2. भूमि बंदोबस्त हो जाने के कारण खालसा भूमि में भू-राजस्व नकद के रूप में लिया जा रहा था जबकि जागीर भूमि में भूमि बंदोबस्त नहीं होने के कारण फसल (जिन्स) के रूप में लिया जा रहा था। अतः खालसा क्षेत्र में किसानों की स्थिति अच्छी थी।

राजा, सामंत से सामंत, जनता से कर वसूलते थे। आपदा की स्थिति में करों को माफ कर दिया जाता था या छूट दे दी जाती था। युद्ध की स्थिति में राजा सेना के लिए सामंतों पर तथा सामंत किसानों पर निर्भर थे। इस प्रकार राजा, सामंत एवं किसान एक-दूसरे पर निर्भर थे।

अंग्रेजों के आगमन के बाद राजा, सामंत एवं किसानों के आपसी संबंध बिगड़ गए। राजा और सामंत विलासी हो गए और किसानों पर विभिन्न प्रकार के कर थोप दिए गए जिससे किसानों में असंतोष उत्पन्न हुआ।

राजस्थान में किसान आंदोलनों के कारण

भू-राजस्व अधिक था और इसमें कभी भी वृद्धि कर दी जाती थी।
लाग-बाग की संख्या अधिक थी।
बेगार प्रथा थी।
राजा ने सामंतों की चाकरी (सेवा) को रोकड़ (नकद) में परिवर्तित कर दिया था।
अंग्रेज नीतियों के कारण कुटीर-उद्योग धंधे नष्ट हो गए। जिससे कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ गई।
अफीम की खेती पर रोक लगा दी गई थी।
पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव। जिससे राजाओं के बला से जीवन में वृद्धि हुई और किसानों पर करभार बढ़ाया गया।
जागीरदारी शोषण बढ़ गया और न्याय की उम्मीद समाप्त हो गई।
चंवरी कर लगा दिया गया।
जकात की दर में वृद्धि कर दी गई।
नीमूचणा में राजपूत एवं ब्राह्मण किसानों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए है।


राजस्थान में किसान आंदोलनों की विशेषताएं/प्रकृति/स्वरूप

1. खालसा क्षेत्रों की तुलना में जागीरी क्षेत्रों में अधिक किसान आंदोलन हुए थे।

2. अधिकतर किसान आंदोलन अहिंसात्मक थे। (अपवाद - मेव किसान आंदोलन)

3. किसानों ने आर्थिक शोषण के साथ-2 सामाजिक असमानता का भी विरोध किया था।

4. ज्यादातर किसान आंदोलन जातीय पंचायतों द्वारा चलाए गए थे। जिससे किसान आसानी से संगठित हो पाए। (जैसे बिजौलिया किसान आंदोलन धाकड़ जाति के किसानों द्वारा शुरू किया गया)

5. प्रजामंडल आंदोलनों ने इन किसान आंदोलनों को अपना समर्थन प्रदान किया था।

6. ज्यादातर किसान आंदोलनों का नेतृत्व बाहरी लोगों द्वारा किया गया। जैसे - विजय सिंह पथिक, हरिभाऊ उपाध्याय, यासीन खां, सर छोटू राम चौधरी, ठाकुर देशराज।

7. पूंजीपतियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। (जैसे - जमनालाल बजाज, रामनारायण चौधरी, सत्यनारायण सर्राफ)

8. इन आंदोलनों में आर्य समाज का प्रभाव था।

NOTE:- शेखावाटी में आर्य समाज की स्थापना मंडावा में देवीबक्श सर्राफ ने की थी।

राजस्थान में किसान आंदोलनों के परिणाम/प्रभाव

1. जागीरदारी उन्मूलन हुआ।
2. राजनैतिक चेतना का संचार हुआ।
3. नगरीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला।
4. महिला सशक्तिकरण हुआ। (जैसे - अंजना देवी, किशोरी देवी, उत्तमा देवी)
5. प्रजामंडल आंदोलनों की रूपरेखा तैयार हुई।
6. हमारा राष्ट्रीय आंदोलन के साथ संपर्क स्थापित हुआ। अर्थात देसी रियासते ब्रिटिश भारत के साथ जुड़ रही थी।
7. राष्ट्रीय एकता मजबूत हुई।
8. लोकतंत्र स्थापना में सहयोग किया।

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