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भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ।। Famous Indian Scientist

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1. सुश्रुत

सुश्रुत का जन्म 600 वर्ष ईसा पूर्व हुआ था। वह विश्वामित्र के वंशज थे। उन्होंने प्रारंभिक चिकित्सीय ज्ञान वाराणसी में धन्वंतरी के आश्रम में प्राप्त किया था। सुश्रुत ने सर्वप्रथम संसार को शल्य चिकित्सा का परिष्कृत ज्ञान प्रदान किया। उनके द्वारा रचित "सुश्रुत संहिता" में शल्य चिकित्सा संबंधी ऐसा ज्ञान है जो आज भी प्रासंगिक है।

 सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया था। इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। उन्होंने शल्य चिकित्सा का परिष्कार किया, अनेक जटिल ऑपरेशन कर प्रस्तुत किए तथा शल्य चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाले अनेक यंत्रों का ज्ञान संसार को कराया।

 वह पहले चिकित्सक थे,जिन्होंने उस शल्य चिकित्सा का प्रचार किया जिसे आज सिजेरियन ऑपरेशन कहते हैं। वह मूत्र नलिका की पथरी निकालने में, टूटी हड्डियों को जोड़ने में, मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा में बहुत दक्ष थे, जोसेफ लिस्टर से भी कई शताब्दी पहले उन्होंने अपूति(Asepsis) दोष का विचार किया। उन्होंने शल्य चिकित्सकों को ऑपरेशन से पहले अपने उपकरणों को गर्म करने के लिए निर्देशित किया ताकि कीटाणु मर जाए और अपूति दोष न हो। उन्होंने शल्य चिकित्सा के उपरांत के मामलों में रक्त का थक्का जमने से रोकने के लिए विषहीन जोंकों का इस्तेमाल किया। आज वैज्ञानिक जगत जानता है कि जोंके खून चूसते समय अपनी लार से खून में हिपेरिन स्रावित करती है,जो थक्का जमने से रोकने में सहायक है।

       सुश्रुत संहिता में नाक, कान और होंठ की प्लास्टिक सर्जरी का भी उल्लेख है। सुश्रुत द्वारा 26 शताब्दी पहले नाक की प्लास्टिक सर्जरी के उदाहरण ग्रंथों में मिलते हैं। वास्तव में उन्हें प्लास्टिक सर्जरी का पिता कहा जा सकता है।
सुश्रुत ने अपनी संहिता में शरीर के विभिन्न अंगों के ऑपरेशन एवं उन पर पट्टियां बांधने व सीने की विधियां तथा तरीके समझाए हैं। उन्होंने शल्य  क्रिया के 101 यंत्रों का ज्ञान कराया है। उनके संदश यंत्र आधुनिक सर्जन के स्प्रिंग फोरसेप्स या काटने एवं पट्टी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाली फ़ारसेप्स या चिमटियों के पूर्व रूप है।उन्होंने चिकित्सालय की साफ सफाई के विषय में भी उपयोगी निर्देश दिए हैं।
   इससे प्रमाणित होता है कि चिकित्सा विज्ञान में भारत बाकी देशों से बहुत आगे था। उनका ज्ञान सुश्रुत संहिता अन्य देशों में बहुत प्रसिद्ध हुआ। आठवीं शताब्दी में इसका अनुवाद अरबी भाषा में "किताबे सुश्रुत" के नाम से किया गया अरब एवं ईरान के प्रसिद्ध चिकित्सकों टेजीए एवं राजी ने सुश्रुत को शल्य विज्ञान का महानतम चिकित्सक माना है।


2. चरक

चरक शताब्दियों से आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र के महान आचार्य के रूप में प्रख्यात रहे हैं। उनके द्वारा लगभग 20 शताब्दी पूर्व लिखा गया ग्रंथ चरक संहिता आज भी चिकित्सा जगत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। चरक संहिता आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र के प्राचीनतम ग्रंथों में है। यह संस्कृत भाषा में है तथा गद्य और पद्य दोनों में लिखी गई है।
 चरक ने चरक संहिता में बालक की उत्पत्ति से लेकर विकास का वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया है। शरीर की रचना, विभिन्न अंगों की बनावट,उनके कार्य, विभिन्न प्रकार के रोग, उनके लक्षण तथा उपचार,आहार,दवाओं के नाम, उनके गुण तथा उनकी सहायता से रोग उपचार आदि बातों का विस्तृत वर्णन चरक संहिता के आठ खंडों में किया गया है।

 चरक संहिता 2000 वर्षों तक अपने विषय पर मानकीकृत संहिता रही। विश्व की कई भाषाओं में इसका  अनुवाद किया गया। विदेशों में इस ग्रंथ की सहायता से चिकित्सा के सूत्र सीखे गए।
     चरक पहले चिकित्सक थे जिन्होंने पाचन,उपापचय और शरीर की प्रतिरक्षा की अवधारणा दी। उनके अनुसार शरीर के कार्य के कारण उसमें तीन दोष है:  पित्त, कफ एवं वायु। जब तक इनका संतुलन रहता है, मानव शरीर स्वस्थ रहता है। बीमारी तब उत्पन्न होती है जब शरीर में मौजूद तीनों दोष असंतुलित हो जाते हैं।
 चरक ने अनुवांशिकी के मूल सिद्धांतों को आज से 2000 वर्ष पूर्व ही जान लिया था। उन्होंने उन कारणों का पता था जिससे शिशु का लिंग निश्चित होता है। बच्चे में आनुवांशिक दोष जैसे लंगड़ापन या अंधापन मां या पिता में किसी अभाव या त्रुटि के कारण उत्पन्न नहीं होते हैं, त्रुटि उनके डिंबाणु या शुक्राणुओं में होती है।यह आज एक स्थापित तथ्य है।

   चरक ने शरीर रचना एवं भिन्न- भिन्न अंगों की गहराई से अध्ययन किया। वह पहले चिकित्सक थे जिन्होंने बताया कि हृदय शरीर का नियंत्रण केंद्र है तथा यह शरीर से कुछ मुख्य धमनियों द्वारा जुड़ा है। चरक ने चरक संहिता में चिकित्सकों व चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए कुछ निर्देशों एवं प्रतिज्ञा का भी उल्लेख किया है। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए लिखा है कि स्नान ध्यान कर शरीर को पवित्र करें। यज्ञ द्वारा देवताओं को प्रसन्न कर गुरु का आशीर्वाद लेकर प्रतिज्ञा करें - "मैं आजन्म ब्रह्मचारी रहूंगा। किसी से द्वेष नहीं रखूंगा। सादा भोजन करूंगा रोगियों की उपेक्षा नहीं करूंगा। उनकी सेवा अपना धर्म समझूंगा।अपने ज्ञान पर घमंड नहीं करूंगा,"आदि

 चरक के अनुसार चिकित्सकों को रोगियों से किसी दशा में शत्रुता नहीं रखनी चाहिए। रोगी की घर की बातों को बाहर नहीं बताना चाहिए  चिकित्सक को सदैव ज्ञान की खोज में तत्पर रहना चाहिए। चरक संहिता में इन निर्देशों एवं प्रतिज्ञाओं को विस्तार से बताया गया है।
 चरक ने स्वयं इन निर्देशों का पालन किया। 'चर' का अर्थ है - चलना। वे पीड़ित जनता का इलाज करने तथा उन्हें शिक्षा देने दूर-दूर तक पैदल जा यात्रा करते थे, इसलिए उनका नाम चरक पड़ा। उनका नाम चिकित्सा जगत में सदैव आदर एवं सम्मान से लिया जाता रहेगा।

3. आर्यभट्ट

 आर्यभट्ट का जन्म सन 476 में हुआ। वे वर्तमान बिहार की राजधानी पटना के निकट कुसुमपुर में के रहने वाले थे। आर्यभट्ट गुप्त काल के महान गणितज्ञ तथा खगोल शास्त्री थे।
आर्यभट्ट प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि पृथ्वी गोल है तथा वह अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन एवं रात उत्पन्न होते हैं। उन्होंने पृथ्वी के आकार,गति एवं परिधि का अनुमान लगाया तथा सूर्य एवं चंद्र ग्रहण के विषय में अनुसंधान किया। उन्होंने इस धारणा को गलत सिद्ध किया कि सूर्य और चंद्र ग्रहण राहु और केतु के प्रकोप से होते हैं। उन्होंने सर्वप्रथम लोगों को बताया कि चंद्रमा और पृथ्वी की परछाई पड़ने से ग्रहण होता है। उन्होंने घोषणा की कि चंद्रमा स्वयं नहीं चमकता बल्कि सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। उन्होंने ग्रहों की अनियमित गति को समझाने के लिए उन्होंने अधिचक्र सिद्धांत का उपयोग किया।

गणित के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिए। उन्होंने π (पाई) का मान 3.1416 बताया और पहली बार कहा कि यह सन्निकट अनुमान है। दुनिया में सर्वप्रथम उन्होंने ही बीजगणित का ज्ञान विस्तार से प्रकट किया उन्होंने तीन ग्रंथ दुनिया को दिए दशगीतिका,आर्यभट्टीय तथा तंत्र। इन ग्रंथों में संस्कृत के श्लोकों के रूप में गणित एवं खगोल शास्त्र से संबंधित कई गूढ़ जानकारियां भरी है।

 बीजगणित के अनिर्धारित समीकरणों को हल करने,भिन्नो में गुणा एवं भाग देने,विविध आकृतियों के क्षेत्रफल निकालने,वर्गमूल एवं घनमूल करने, विभिन्न श्रेणियों का वर्गमूल वर्गीकरण करने आदि की विधियां उन्होंने केवल कुछ श्लोकों में कह दी यदि वर्तमान पद्धति में इन्हें लिखा जाए तो कई गुना विशालकाय ग्रंथ बन जाए।

 उन्होंने त्रिकोणमिति का वर्णन भी किया है। वे पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने ज्या एवं उत्क्रमज्या सारणीयां दी। उन्होंने बहुत बड़ी संख्याओं को संक्षेप में लिखने की विधि प्रतिपादित की।
 उनकी खगोलीय गणनाएं इतनी सटीक थी कि आज भी पंचांग बनाने के लिए आर्यभट्ट की खगोलीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है। गणित का उनका ज्ञान देख कर आज भी बड़े-बड़े गणितज्ञ उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हैं। उनका यश भारत से बाहर विदेशों में भी खूब फैला। गणित एवं खगोल विज्ञान में उनके योगदान की स्मृति में भारत के पहले उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया।


4. वराहमिहिर

वराह मिहिर का जन्म सन 499 में उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के निकट कपित्थ नामक ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम आदित्यदास तथा माता का नाम सत्यवती था। आदित्यदास सूर्य के भक्त थे। उन्होंने पुत्र प्राप्ति पर उनका नाम मिहिर रखा। मिहिर का अर्थ होता है - सूर्य। बड़ा होने पर मिहिर ने अपने पिता आदित्यनाथ से ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त किया था। तथा इस विद्या का गहन अध्ययन किया। उनकी विद्या से प्रभावित होकर राजा विक्रमादित्य ने उन्हें अपने दरबार का रत्न बनाया।

 मिहिर की विद्वता,खगोलीय ज्ञान एवं गणना में प्रवीणता तथा ज्योतिष द्वारा की गई सटीक भविष्यवाणियों के कारण विक्रमादित्य ने उस समय के मगध राज्य का सबसे बड़ा पुरस्कार वराह  चिन्ह प्रदान किया। उसी समय से मिहिर को लोग वराहमिहिर के नाम से पुकारने लगे।

वराहमिहिर खगोल विज्ञान तथा ज्योतिष विद्या के महान ज्ञाता थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिक आर्यभट्ट की इस धारणा को पुष्ट किया कि धरती गोल है। विज्ञान के इतिहास में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि कोई ऐसी शक्ति है जो वस्तुओं को जमीन से बांधे रखती है। वैज्ञानिक इस शक्ति को आज गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।
 वराहमिहिर ने खगोल एवं ज्योतिष विद्या पर जो ग्रंथ लिखे उनसे उनके विशद एवं व्यापक ज्ञान का पता चलता है। उनकी पुस्तकों पंच सिद्धांतिका,बृहत्संहिता, बृहज्जातक ने उन्हें खगोल एवं ज्योतिष में वह स्थान दिलाया जो राजनीति शास्त्र में कौटिल्य एवं व्याकरण में पाणिनि का है।

 वराह मिहिर ने पर्यावरण, जल विज्ञान एवं भू विज्ञान के बारे में भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां की है। उन्होंने मिट्टी को उपजाऊ बनाने, खाद बनाने, फलों- फूलों की अधिक उपज पाने,उन्नत बीज उत्पन्न करने की विधियों तथा पेड़ पौधों पर मौसम के पड़ने वाले प्रभाव का बहुत विशद वर्णन किया है उनका कहना है कि पौधे और दीमक जमीन के नीचे पानी को इंगित करते हैं। आज वैज्ञानिक जगत द्वारा इन जानकारियों का उपयोग किया जा रहा है।
 वराहमिहिर ने सुदूर देशों की यात्रा कर लोगों में अपने ज्ञान को बांटा। उनके कुछ ग्रंथों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी किया गया।

5. सी.वी. रमन



चंद्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली शहर में हुआ।
इनके पिता चंद्रशेखर अय्यर एवं माता पार्वती अम्मल थी।

इनके पिता विशाखापट्टनम के वॉल्टेयर कॉलेज में भौतिकी शास्त्र के प्राध्यापक थे। रमन ने वॉल्टेयर कॉलेज से इंटर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तथा विश्वविद्यालय में विशेष स्थान प्राप्त किया। वॉल्टेयर कॉलेज में आगे भौतिक विज्ञान के अध्ययन की सुविधा न होने के कारण उन्होंने मद्रास(चेन्नई) के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। यद्यपि परिवार के सदस्यों का मत उन्हें उच्च सरकारी पद प्राप्त करने हेतु इतिहास विषय दिलवाने का था किंतु रमन इतिहास की बजाए अपने रुचि का विषय पढ़ने पर ही अटल रहे। 1907 में रमन ने 19 वर्ष की आयु में भौतिक विज्ञान में एम. ए. की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। एम. ए. उत्तीर्ण करने के बाद उनकी असाधारण प्रतिभा से प्रभावित भौतिक विज्ञान के प्राध्यापकों की अनुशंसा पर सरकार ने रमन को छात्रवृत्ति सहित इनलैंड भेजना स्वीकार कर लिया किंतु ब्रिटिश डॉक्टर ने क्षीणकाय होने से रमन को इंग्लैंड जाने से रोक दिया। पर वे हताश नहीं हुए, परिवारजनों की इच्छा का सम्मान करते हुए अर्थ विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा दी। भौतिक विज्ञान के छात्र होते हुए भी प्रतियोगी परीक्षा, जिसमें साहित्य, इतिहास, संस्कृति एवं राजनीति शास्त्र जैसे विषय थे, में चयनित हुए। फलस्वरुप 19 वर्ष की अल्पायु में भारत सरकार द्वारा अर्थ विभाग के उप महालेखापाल (डिप्टी अकाउंटेंट जनरल) नियुक्त किए गए। परंतु इससे विज्ञान में उनकी रूचि कम नहीं हुई। कोलकाता में इंडियन एसोसिएशन फॉर कंजर्वेशन ऑफ साइंस के रमन सदस्य बन गए। ऑफिस से आने के बाद उनका अधिकांश समय एसोसिएशन की प्रयोगशाला में व्यतीत होता था। वह देर रात तक प्रयोगशाला में अनुसंधान करते और कभी-कभी पूरी रात वही बीत जाती। रमन के प्रारंभिक अनुसंधान का क्षेत्र कम्पन्न एवं शब्द विज्ञान था। आपने वीणा, मृदंग,तानपुरा आदि भारतीय वाद्य यंत्रों तथा वायलिन,पियानो आदि विदेशी यंत्रों के ध्वनिक गुणों की खोज कर मौलिक सिद्धांत प्रतिपादित किए। राजकीय सेवा में रहते हुए विज्ञान हेतु पर्याप्त समय न मिल पाने के कारण  1917 में रमन ने डाक तार विभाग के महालेखापाल के पद से त्यागपत्र दे दिया।
इसके बाद वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर बने। इस पद पर रहते हुए ही रमन ने अपने विश्व प्रसिद्ध "रमन प्रभाव" की खोज की, जो उन्होंने 1928 में पूर्ण किया। रमन प्रभाव की खोज पर वर्ष 1930 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
   इस प्रभाव में उन्होंने सिद्ध कर दिया की जब प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम से गुजरता है तो प्रकीर्णन के फलस्वरुप उसकी आवृत्ति में परिवर्तन आ जाता है। आवृत्ति में होने वाले अति सूक्ष्म परिवर्तनों से माध्यम की आंतरिक अणु संरचना का पता लगाया जा सकता है।
"रमन प्रभाव"की खोज में विशेष बात यह थी कि केवल ₹200 के उपकरणों एवं न के बराबर सुविधाओं के साथ रमन ने यह खोज की थी।

विश्व के अनेक देशों द्वारा उनको सम्मानित एवं पुरस्कृत किया गया। कई देशी एवं विदेशी विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें मानद् डॉक्टरेट की उपाधि दी गई। भारत सरकार ने 1949 उन्हें राष्ट्रीय प्राध्यापक नियुक्त किया तथा 1954 में उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया। डॉ रमन विज्ञान का प्रयोग युद्ध क्षेत्र में करने के पक्ष में नहीं थे। वे शांति एवं जनकल्याण के कार्यो हेतु ही विज्ञान का प्रयोग उचित समझते थे। उनके इन वैज्ञानिक शांतिपूर्ण कार्यों द्वारा राष्ट्रों के मध्य मैत्री विकसित करने के उपलक्ष्य में सन 1958 में उन्हें  "लेनिन शांति पुरस्कार" से सम्मानित किया गया।

डॉ रमन भारत में वैज्ञानिक अध्ययन एवं अनुसंधान की प्रगति हेतु सदैव प्रयासरत रहे। आपके प्रयत्नों के फलस्वरुप देश में अनेक स्वतंत्र प्रयोगशालाएं, विश्वविद्यालय एवं वैज्ञानिक संस्थान स्थापित हुई। भारतीय विज्ञान अकादमी, रमन शोध संस्थान, आंध्र विश्वविद्यालय, विज्ञान व तकनीकी महाविद्यालय, वॉल्टेयर आदि की स्थापना रमन के प्रयत्नों का ही फल है।
   रमन 80 वर्ष की आयु में भी तरुण तपस्वी के समान वैज्ञानिक अनुसंधान में लीन रहते थे। उन्होंने चुंबकीय शक्ति, एक्स किरण, पदार्थ की संरचना, वर्ण तथा ध्वनि पर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान किए। इनमें सुदीर्घ आयु में भी पूर्ण स्पूर्ति, उत्साह एवं लगन विद्यमान रही। 20 नवंबर 1970 में अपनी मृत्यु तक विज्ञान की खोज कार्य में वह लगातार संलग्न रहे। उनके सम्मान एवं रमन प्रभाव की खोज के उपलक्ष में हर वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता ह


6. होमी जहांगीर भाभा


डॉ. होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई के एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ। उनके पितामह डॉ.हुरमुस तत्कालीन मैसूर राज्य में शिक्षा विभाग के निदेशक थे तथा इनके पिता श्री जे.एच. भाभा मुंबई के बड़े बैरिस्टर माने जाते थे। उनके घर पर विज्ञान की पुस्तकों का बड़ा पुस्तकालय था। बचपन से ही वह विज्ञान में दिलचस्पी लेने लगे थे। मुंबई के कैथेड्रल जाॅन केनन हाई स्कूल एवं एलीफेस्टन कॉलेज से शिक्षा पाने के बाद उच्च अध्ययन हेतु वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। जहां उन्होंने गणित एवं अभियांत्रिकी का अध्ययन किया किंतु उनकी रुचि भौतिक की तरफ थी। 1930 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक होने के उपरांत उन्होंने सैद्धांतिक भौतिकी का विशेष अध्ययन प्रारंभ किया। विदेश में शिक्षा पाते समय उन्हें कई मेडल एवं छात्रवृत्तियां मिली। उन्हें 1934 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी की उपाधि से विभूषित किया गया। 1940 में वे भारतीय विज्ञान संस्थान,बंगलौर आ गए, जहां 1942 में उन्हें अंतरिक्ष किरणों का प्राध्यापक बना दिया गया।

 विदेश में अनेक वर्षों तक रहने पर भी उन्हें अपने देश पर बड़ा गर्व था। वे भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर देखना चाहते थे। उन्हें अपने देश के वैज्ञानिकों की क्षमता पर अटूट विश्वास था। उनका मानना था कि न्यूक्लियर, उच्च ऊर्जा तथा मूल कण भौतिकी की आधुनिक तकनीक देश में ही विकसित की जा सकती है, यदि एक ऐसी संस्था है जो केवल इसी क्षेत्र में शोध को समर्पित हो। भाभा देश के अग्रणी टाटा परिवार से संबंधित थे। उन्होंने टाटा ट्रस्टीज से एक शोध संस्थान बनाने का आग्रह किया। उनका कहना था कि यदि देश में ऐसा संस्थान हो तो जब देश की विद्युत शक्ति के लिए परमाणु बिजलीघर बनाने की बारी आएगी तब विशेषज्ञों के लिए विदेश की तरफ नहीं देखना पड़ेगा। जब अन्य वैज्ञानिक परमाणु से विनाश के लिए ऊर्जा ढूंढ रहे थे,यह भारतीय वैज्ञानिक उस समय उसके शांतिपूर्ण उपयोगों के लिए सोच रहा था।
 
        सन् 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना हुई। देश के स्वतंत्र होने के उपरांत 1948 में परमाणु शक्ति आयोग की स्थापना की गई एवं भाभा इसके अध्यक्ष बने। भाभा के कुशल निर्देशन में तीन परमाण्विक रिएक्टरों-अप्सरा, सायरस एवं जरलीना की स्थापना हुई। 1963 में देश के पहले परमाणु बिजलीघर का निर्माण तारापुर में शुरू हुआ। 2 वर्ष बाद उनके निर्देशन में प्लूटोनियम प्लांट भी लगा दिया गया। यह एक बहुत बड़ा कदम था। भाभा ने अपने देशवासियों और संसार को यह दिखा दिया कि भारतीय वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने में किसी से पीछे नहीं है। यह भाभा दूरगामी सोच का ही परिणाम है कि आज भारत परमाणु शक्ति के विषय में आत्मनिर्भर है।

डॉ भाभा ने इलेक्ट्रॉनिक्स,अंतरिक्ष विज्ञान, रेडियो खगोल विज्ञान,सूक्ष्म जीव विज्ञान आदि विषय में भी अत्यंत महत्वपूर्ण अनुसंधान किए। उन्होंने अंतरिक्ष किरणों में एक नए प्राथमिक कण  मेसॉन की उपस्थिति को पहचाना। इस कण से उन्होंने आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत का प्रायोगिक प्रमाण भी दिया। ऊटी में लगा विशाल रेडियो टेलीस्कोप उन्हीं की देन है। डॉ भाभा भारत में ही नहीं, विश्वभर में अपनी प्रतिभा के कारण विख्यात थे। उनकी सलाह को सभी वैज्ञानिक बड़े आदर से सुनते थे। सितंबर 1956 में जब 81 राष्ट्रों का सम्मेलन आणविक एजेंसी की स्थापना के लिए न्यूयॉर्क में हुआ तो सर्वसम्मति से सम्मेलन का अध्यक्ष डॉ.भाभा को बनाया गया।

भाभा केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं वरन् अत्यंत कुशल प्रशासक एवं कला प्रेमी भी थे। भाभा अविवाहित थे। वे कहा करते थे कि उनका विवाह सृजनात्मकता के साथ हुआ है। वे उच्च कोटि के चित्रकार भी थे। उनके बनाए हुए कुछ चित्र ब्रिटिश कला दीर्घाओं में सुरक्षित है।

26 जनवरी 1966 को जब वे अंतर्राष्ट्रीय परमाणु शक्ति सम्मेलन में भाग लेने विएना जा रहे थे, हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। 1967 में परमाणु शक्ति संस्थान, ट्रांबे का नाम बदलकर भाभा के समर्पित कार्य के सम्मान एवं श्रद्धांजलि के रूप में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) रख दिया गया। डॉ. भाभा आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका नाम विकासशील भारत के इतिहास में प्रेरक शक्ति के रूप में लिखा जाएगा।

7. विक्रम साराभाई



विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में हुआ। उनके पिता का नाम अंबालाल तथा माता का नाम सरला देवी था। उनका परिवार संपन्न था तथा वे चाहते तो उद्योगपति बन सकते थे। लेकिन साराभाई की रूचि गणित एवं भौतिकी में थी। उन्होंने 20 वर्ष की आयु में कैंब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन से भौतिकी में त्रिपोस(Tripos) परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। कॉस्मिक किरणों पर उनके अनुसंधान के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने 1947 में उन्हें पीएचडी की उपाधि प्रदान की।
         
डॉ विक्रम साराभाई ने अपना संपूर्ण जीवन भारत में विज्ञान की प्रगति एवं विकास के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का पिता माना जाता है। ब्रिटेन से पीएचडी करके लौटने पर उन्होंने भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory) की नींव अहमदाबाद में रखी। यह संस्था अंतरिक्ष किरणों और बाह्य  अंतरिक्ष के अध्ययन को समर्पित है। डॉ. साराभाई ने सौर भौतिक एवं अंतरिक्ष किरणों पर शोध को भारत में बढ़ावा देने के लिए गुलमर्ग, तिरुअनंतपुरम तथा कोडाईकनाल में भी प्रयोगशाला स्थापित की।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। सोवियत संघ के द्वारा स्पूतनिक उपग्रह छोड़े जाने के उपरांत उन्होंने सरकार को भारत के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सफलतापूर्वक समझाया। वास्तव में यह साराभाई ही थे जो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का विस्तार करके देश को अंतरिक्ष युग में ले गए।आज अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनीकी में भारत की जो भी उपलब्धियां हैं,उनका श्रेय साराभाई को ही है। यद्यपि वह अपने परिश्रम का परिणाम देखने के लिए जीवित नहीं रहे। उन्होंने प्रथम भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट के निर्माण एवं प्रक्षेपण की परियोजना की शुरुआत की। सन् 1975-76 में सेटेलाइट इंसट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) कार्यक्रम, जिसका लक्ष्य 2400 भारतीय गांवों तक शिक्षा पहुंचाना था, का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

                यद्यपि साराभाई अंतरिक्ष कार्यक्रमों में व्यस्त थे, लेकिन वे अपनी पहली पसंद अंतरिक्ष किरणों के अध्ययन को नहीं भूले। उन्होंने यह जानने के लिए गहन शोध किए की इन किरणों में समय के साथ क्या और कैसे परिवर्तन होता है तथा इस क्रिया से जुड़ी अन्य बातों का क्या तात्पर्य है।

            साराभाई समाज और संसार से अलग रहकर एकांत में अनुसंधानरत रहने वाले वैज्ञानिक नहीं थे। उन्होंने परिवार के कपड़ा एवं औषधि उद्योग में भी पूरी रूचि ली तथा उसका प्रबंधन किया। उन्होंने कपड़ा उद्योग के आधुनिकीकरण हेतु संस्थान एवं प्रबंधकीय दक्षता हेतु भारतीय प्रबंध संस्थान(IIM), अहमदाबाद की स्थापना की।

          31 दिसंबर 1971 को मात्र 52 वर्ष की अल्पायु में उनका देहांत हो गया। विज्ञान में समाज की सेवा के लिए उन्हें कई पुरस्कार एवं सम्मान मिले। भारत सरकार ने उन्हें पदम भूषण तथा पदम विभूषण से सम्मानित किया। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) का नामकरण उनके सम्मान में किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने चंद्रमा के सी ऑफ सिरिनिटी क्षेत्र में एक क्रेटर का नाम इनके नाम पर रखकर उन्हें सम्मानित किया है।

8. डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

       डॉ अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम का जन्म तत्कालीन मद्रास (वर्तमान तमिलनाडु) के रामेश्वरम जिले के धनुषकोड़ी कस्बे में 15 अक्टूबर 1931 को हुआ था। उनके पिता का नाम जैनुलाबदीन एवं माता का नाम आशियम्मा था। रामेश्वरम में प्रारंभिक शिक्षा के बाद कलाम पड़ोसी कस्बे राम‌नाथपुरम के श्वाटर्ज हाई स्कूल में विज्ञान का अध्ययन करने के लिए दाखिल हुए। यहां अध्यापक अयादुरै सोलोमन उनकी प्रेरणा स्त्रोत बने। सोलोमन का गुरु मंत्र- जीवन में सफलता एवं परिणाम पाने के लिए तीन मुख्य बातों की जरूरत है: इच्छाशक्ति, आस्था एवं उम्मीद- कलाम के जीवन में सफलता का आधार बना।

        तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात 1954 में कलाम मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के अध्ययन हेतु दाखिल हुए। कलाम एक सामान्य परिवार से संबंध रखते थे,उनके पास इस संस्थान का शुल्क वहन करने का सामर्थ्य नहीं था। लेकिन कलाम की बहन जोहरा ने अपने गहने गिरवी रख उनके शुल्क का प्रबंध किया। दाखिले के बाद कलाम ने कठोर परिश्रम किया तथा संस्थान की छात्रवृत्ति प्राप्त कर अपना अध्ययन पूर्ण किया।
 
              1958 में कलाम रक्षा अनुसंधान एवं विज्ञान संस्थान में हावर क्राफ्ट परियोजना पर काम करने हेतु वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक रूप में नियुक्त हुए। 1962 में प्रोफेसर एस.जी.के. मेनन , कलाम की लगन एवं मेहनत से प्रभावित होकर उन्हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन मे ले गए। यहां डॉ. कलाम के जीवन का एक नया अध्याय आरंभ हुआ।

कलाम को थुम्बा स्थित उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV = Satellite Launching Vehicle ) परियोजना का निदेशक बनाया गया। जहां उन्होंने भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV-3 के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे जुलाई 1980 में रोहिणी उपग्रह सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। 1981 में कलाम को पदम भूषण से सम्मानित किया गया।

           1982 में कलाम भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में वापिस निदेशक के रूप में आ गए। यहां उन्होंने अपना सारा ध्यान इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) पर केंद्रित कर दिया। कलाम के नेतृत्व में स्वदेशी तकनीक पर आधारित पांच मिसाइलों: पृथ्वी, नाग, त्रिशूल, आकाश एवं अग्नि के सफल परीक्षण किए गए। आज इन मिसाइलों के कारण भारतीय सेना का आत्मविश्वास बढ़ा है तथा भारत आत्मरक्षा के मजबूत साधनों से सुसज्जित हुआ है।

         1 जुलाई 1992 में कलाम भारतीय रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए। उनकी देखरेख में 1998 पोकरण में भारत ने अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण के पश्चात भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रो की सूची में शामिल हो गया।

       डॉ. कलाम को भारत सरकार ने 1997 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। जुलाई 2002 में इस महान वैज्ञानिक को देश का राष्ट्रपति चुना गया।

27 जुलाई 2015 को अब्दुल कलाम की मृत्यु हो गई।
     
डॉ. कलाम अपने व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह अनुशासन, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करने वालो में रहे। कलाम ने अपनी असाधारण प्रतिभा, संकल्प शक्ति, लगन, कठोर परिश्रम एवं प्रबंध कौशल से जीवन में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की। वे अविवाहित रहे तथा उन्होंने स्वयं को पूरी तरह देश के विकास हेतु समर्पित कर दिया। वे कुरान एवं भगवत गीता का समान रूप से आदर एवं अध्ययन करते थे। उन्होंने कई प्रेरणास्पद पुस्तकों की रचना की और वे तकनीक को भारत के जनसाधारण तक पहुंचाने की हमेशा वकालत करते रहे। वे अपने विचारों एवं कार्यो के कारण  बच्चों एवं युवाओं के मध्य अत्यंत लोकप्रिय थे।


1. चरक के अनुसार शरीर के कार्य के कारण उसमें निम्न में से कौन सा दोष नहीं है?
(क) पित्त
(ख) कफ
(ग) जल ✅✅
(घ) वायु

2. जोसेफ लिस्टर से कई शताब्दी पहले अपूति दोष का विचार दिया ?
(क) चरक ने
(ख) सुश्रुत ने✅✅
(ग) वराहमिहिर ने
(घ) आर्यभट्ट ने

3. आर्यभट्ट द्वारा रचित ग्रंथ है ?
(क) दशगीतिका✅✅
(ख) पंच सिद्धांतिका
(ग) बृहत्संहिता
(घ) बृहज्जातक

4.  वस्तुओं को जमीन से बांधे रखने वाली शक्ति, जिसे आज हम गुरुत्वाकर्षण कहते हैं, के बारे में सर्वप्रथम दुनिया को बताया ?
(क) आर्यभट्ट ने
(ख) न्यूटन ने
(ग) गैलीलियो ने
(घ) वराहमिहिर ने✅✅

5. डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अभियांत्रिकी की कौन सी शाखा का अध्ययन किया ?
(क) विद्युत
(ख) इलेक्ट्रॉनिकी
(ग)  एरोनॉटिकल✅✅
(घ) कम्प्यूटर

6. सर सी. वी. रमन को नोबेल पुरस्कार मिला ?
(क) 1928
(ख) 1930✅✅
(ग) 1932
(घ) 1934

7. डॉ भाभा ने अंतरिक्ष किरणों में किस कण की उपस्थिति को पहचाना ?
(क) मेसॉन✅✅
(ख) इलेक्ट्रॉन
(ग) न्यूट्रॉन
(घ) पॉज़िट्रान

8. डॉक्टर साराभाई द्वारा स्थापित भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला स्थित है ?
(क) दिल्ली
(ख) बंगलोर
(ग) अहमदाबाद✅✅
(घ) त्रिवेंद्रम

9. राष्ट्रीय विज्ञान दिवस कब मनाया जाता है ?
(क) 28 जनवरी
(ख) 28 फरवरी ✅✅
(ग) 15 मार्च
(घ) 2 अप्रैल

10. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का पिता किसे कहते हैं ?
(क) डॉ होमी जहांगीर भाभा
(ख) विक्रम साराभाई  ✅✅
(ग) एपीजे अब्दुल कलाम
(घ) सर सी वी रमन

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